शनिवार, 8 अगस्त 2020

सैड शायरी : Sad Shayari

Sad Shayari

कर रहा था ग़म-ए-जहाँ का हिसाब,
आज तुम याद आए बे हिसाब।

ऐ मोहब्बत तिरे अंजाम पे रोना आया,
जाने क्यूँ आज तिरे नाम पे रोना आया।

अब तो ख़ुशी का ग़म है न ग़म की ख़ुशी मुझे,
बे-हिस बना चुकी है बहुत ज़िंदगी मुझे।

किसी के तुम हो किसी का ख़ुदा है दुनिया में,
मिरे नसीब में तुम भी नहीं ख़ुदा भी नहीं।
 
इश्क का धंधा ही बंद कर दिया साहेब,
मुनाफे में जेब जले, और घाटे में दिल।

कभी ख़ुद पे कभी हालात पे रोना आया,
बात निकली तो हर इक बात पे रोना आया।

न जाने किस लिए उम्मीद-वार बैठा हूँ,
इक ऐसी राह पे जो तेरी रहगुज़र भी नहीं।

ख़ुदा की इतनी बड़ी काएनात में मैं ने,
बस एक शख़्स को माँगा मुझे वही न मिला।  

मेरी क़िस्मत में ग़म गर इतना था,
दिल भी या-रब कई दिए होते।

तेरा मिलना ख़ुशी की बात सही,
तुझ से मिल कर उदास रहता हूँ।

कौन रोता है किसी और की ख़ातिर ऐ दोस्त,
सब को अपनी ही किसी बात पे रोना आया।

हम तो कुछ देर हँस भी लेते हैं,
दिल हमेशा उदास रहता है।

ऐ ग़म-ए-ज़िंदगी न हो नाराज़,
मुझ को आदत है मुस्कुराने की।

हम तो समझे थे कि हम भूल गए हैं उन को,
क्या हुआ आज ये किस बात पे रोना आया।

हमारे घर का पता पूछने से क्या हासिल,
उदासियों की कोई शहरियत नहीं होती।

दुनिया की महफ़िलों से उकता गया हूँ या रब,
क्या लुत्फ़ अंजुमन का जब दिल ही बुझ गया हो।

हाए कितना लतीफ़ है वो ग़म,
जिस ने बख़्शा है ज़िंदगी का शुऊर।

मैं हूँ दिल है तन्हाई है,
तुम भी होते अच्छा होता।

शाम भी थी धुआँ धुआँ हुस्न भी था उदास उदास,
दिल को कई कहानियाँ याद सी आ के रह गईं।

अभी न छेड़ मोहब्बत के गीत ऐ मुतरिब,
अभी हयात का माहौल ख़ुश-गवार नहीं।

चुपके चुपके रात दिन आँसू बहाना याद है,
हम को अब तक आशिक़ी का वो ज़माना याद है।

नहीं आती तो याद उन की महीनों तक नहीं आती,
मगर जब याद आते हैं तो अक्सर याद आते हैं।

आज इक और बरस बीत गया उस के बग़ैर,
जिस के होते हुए होते थे ज़माने मेरे।

पत्थर के जिगर वालो ग़म में वो रवानी है,
ख़ुद राह बना लेगा बहता हुआ पानी है।

दिल धड़कने का सबब याद आया,
वो तिरी याद थी अब याद आया।

तुम ने किया न याद कभी भूल कर हमें,
हम ने तुम्हारी याद में सब कुछ भुला दिया।

आप के बा'द हर घड़ी हम ने,
आप के साथ ही गुज़ारी है।

सारी दुनिया के ग़म हमारे हैं,
और सितम ये कि हम तुम्हारे हैं।

दिन किसी तरह से कट जाएगा सड़कों पे,
शाम फिर आएगी हम शाम से घबराएँगे।

आज तो जैसे दिन के साथ दिल भी ग़ुरूब हो गया,
शाम की चाय भी गई मौत के डर के साथ साथ।

इस ज़िंदगी में इतनी फ़राग़त किसे नसीब,
इतना न याद आ कि तुझे भूल जाएँ हम।

वफ़ा करेंगे निबाहेंगे बात मानेंगे,
तुम्हें भी याद है कुछ ये कलाम किस का था।

सोचता हूँ कि उस की याद आख़िर,
अब किसे रात भर जगाती है।

दिल ना-उमीद तो नहीं नाकाम ही तो है,
लम्बी है ग़म की शाम मगर शाम ही तो है।

याद उसे इंतिहाई करते हैं,
सो हम उस की बुराई करते हैं।

अब तो हर बात याद रहती है,
ग़ालिबन मैं किसी को भूल गया।

आप की याद आती रही रात भर,
चाँदनी दिल दुखाती रही रात भर।

कर रहा था ग़म-ए-जहाँ का हिसाब,
आज तुम याद बे-हिसाब आए।

हम तो समझे थे कि हम भूल गए हैं उन को,
क्या हुआ आज ये किस बात पे रोना आया।

इक अजब हाल है कि अब उस को,
याद करना भी बेवफ़ाई है।

याद उस की इतनी ख़ूब नहीं दोस्त बाज़ आ,
नादान फिर वो जी से भुलाया न जाएगा।

सुकून दे न सकीं राहतें ज़माने की,
जो नींद आई तिरे ग़म की छाँव में आई।

आज तो जैसे दिन के साथ दिल भी ग़ुरूब हो गया,
शाम की चाय भी गई मौत के डर के साथ साथ।

इस डूबते सूरज से तो उम्मीद ही क्या थी,
हँस हँस के सितारों ने भी दिल तोड़ दिया है।

तुम मिटा सकते नहीं दिल से मिरा नाम कभी,
फिर किताबों से मिटाने की ज़रूरत क्या है।

दिल गया रौनक़-ए-हयात गई,
ग़म गया सारी काएनात गई।

अपनी हालत का ख़ुद एहसास नहीं है मुझ को,
मैं ने औरों से सुना है कि परेशान हूँ मैं।

ख़ुदा ऐसे एहसास का नाम है,
रहे सामने और दिखाई न दे।

तकलीफ़ मिट गई मगर एहसास रह गया,
ख़ुश हूँ कि कुछ न कुछ तो मिरे पास रह गया।

दर्द ओ ग़म दिल की तबीअत बन गए,
अब यहाँ आराम ही आराम है।

आगही कर्ब वफ़ा सब्र तमन्ना एहसास,
मेरे ही सीने में उतरे हैं ये ख़ंजर सारे।

मैं उस के सामने से गुज़रता हूँ इस लिए,
तर्क-ए-तअल्लुक़ात का एहसास मर न जाए।

मौत की पहली अलामत साहिब,
यही एहसास का मर जाना है।

हम को किस के ग़म ने मारा ये कहानी फिर सही,
किस ने तोड़ा दिल हमारा ये कहानी फिर सही।

उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो,
न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए।

कर रहा था ग़म-ए-जहाँ का हिसाब,
आज तुम याद बे-हिसाब आए।

उस की याद आई है साँसो ज़रा आहिस्ता चलो,
धड़कनों से भी इबादत में ख़लल पड़ता है।

मैं रोना चाहता हूँ ख़ूब रोना चाहता हूँ मैं,
फिर उस के बाद गहरी नींद सोना चाहता हूँ मैं।

अच्छा ख़ासा बैठे बैठे गुम हो जाता हूँ,
अब मैं अक्सर मैं नहीं रहता तुम हो जाता हूँ।

एक मुद्दत से तिरी याद भी आई न हमें,
और हम भूल गए हों तुझे ऐसा भी नहीं।

तुम्हारी याद के जब ज़ख़्म भरने लगते हैं,
किसी बहाने तुम्हें याद करने लगते हैं।

जब तुझे याद कर लिया सुब्ह महक महक उठी,
जब तिरा ग़म जगा लिया रात मचल मचल गई।

यही है दौर-ए-ग़म-ए-आशिक़ी तो क्या होगा,
इसी तरह से कटी ज़िंदगी तो क्या होगा।

हम ग़म-ज़दा हैं लाएँ कहाँ से ख़ुशी के गीत,
देंगे वही जो पाएँगे इस ज़िंदगी से हम।

उस ने पूछा था क्या हाल है,
और मैं सोचता रह गया।

चंद कलियाँ नशात की चुन कर मुद्दतों महव-ए-यास रहता हूँ,
तेरा मिलना ख़ुशी की बात सही तुझ से मिल कर उदास रहता हूँ।

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सच है उम्र भर किस का कौन साथ देता है,
ग़म भी हो गया रुख़्सत दिल को छोड़ कर तन्हा।

हमारे घर की दीवारों पे शाहब,
उदासी बाल खोले सो रही है।

इस जुदाई में तुम अंदर से बिखर जाओगे,
किसी मा'ज़ूर को देखोगे तो याद आऊँगा।

हम को न मिल सका तो फ़क़त इक सुकून-ए-दिल,
ऐ ज़िंदगी वगरना ज़माने में क्या न था।

चिंगारियाँ न डाल मिरे दिल के घाव में,
मैं ख़ुद ही जल रहा हूँ ग़मों के अलाव में।

जुदाइयों के ज़ख़्म दर्द-ए-ज़िंदगी ने भर दिए,
तुझे भी नींद आ गई मुझे भी सब्र आ गया।

इश्क़ में कौन बता सकता है,
किस ने किस से सच बोला है।

उठते नहीं हैं अब तो दुआ के लिए भी हाथ,
किस दर्जा ना-उमीद हैं परवरदिगार से।

दुख दे या रुस्वाई दे,
ग़म को मिरे गहराई दे।

सब सितारे दिलासा देते हैं,
चाँद रातों को चीख़ता है बहुत।

अब तो कुछ भी याद नहीं है,
हम ने तुम को चाहा होगा।

दर्द-ए-दिल क्या बयाँ करूँ साहेब,
उस को कब ए'तिबार आता है।

ज़िंदगी कितनी मसर्रत से गुज़रती या रब,
ऐश की तरह अगर ग़म भी गवारा होता।

ज़ख़्म ही तेरा मुक़द्दर हैं दिल तुझ को कौन सँभालेगा,
ऐ मेरे बचपन के साथी मेरे साथ ही मर जाना।

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